मंगलवार, 30 जून 2015

जिंदगी भी हमें आजमाती रही और हम भी उसे आजमाते रहे १

जनवरी, 2011 में एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे तोड़ दिया और स्कूल में छुट्टी को लेकर अनबन हुई और मैंने मन बना लिया कि मार्च में बोर्ड परीक्षा का जैसे मेरा पेपर होगा मैं त्यागपत्र दे दूँगा, क्योंकि मेरी ये नैतिक जिम्मेदारी होती है कि मेरी वजह से बच्चे अधर में न लटक जाएँ।वैसे भी एक ही बच्चा था 12वी में।जिस दिन पेपर खत्म हुआ मैंने रिजाईन कर दिया घर में किसी को बताए बिना।न बताने का कारण यह था कि पिताजी जनवरी, 2011 में ही सेवानिवृत हुए थे और भाई छोटा मेरठ से बी. टेक कर रहा था जिसकी जिम्मेदारी मैं उठाता था।बताता तो सबसे पहले दिमाग में यही आता कि 6 लोगों के परिवार में आमदनी शून्य।चुकिं एक महीने की पूर्व नोटिस देनी पड़ती है तो अप्रैल तक मैं वहाँ रह सकता था, लेकिन इतना टूट गया था अंदर से कि उस विद्यालय की चौखट भी नहीं देखना चाहता था।ऊपर वाले ने भी सुन ली और बोर्ड परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के मुल्यांकन के लिए बोर्ड से पत्र आ गया और मैं विद्यालय से दूर।20 दिन लग गए उसमें, खैर वो काम निपटा कर जब आया तो पूरा खाली दिन भर।इतना टूटा हुआ था कि मन भी कुछ नहीं करता था करने को।नौकरी की ढंग की कोई रिक्तियाँ भी नहीं आ रही थीं ।घर भी नहीं जा सकता था क्योंकि गर्मी की छुट्टियां 25 मई से होती थी, और घर में सबके नजर में यह होता कि मैं इतना जल्दी कैसे आ गया। सोने पे सुहागा देखिए पिताजी आ गए दिल्ली छोटी बहन की शादी के सिलसिले में ।मैंने सोचा की ठीक है आएं हैं तो काम निपटा कर दो-तीन दिनों में चले जाएंगे, लेकिन वो भी सेवानिवृत हुए थे, टिक गए 20 दिन ।एक दिन तो कह दिया कि छुट्टी लिया है, लेकिन उसके आगे? उसके आगे यह कि रोज सुबह 5:30 बजे उठता था, झाड़ू बर्तन करके, दोपहर का खाना बनाकर, स्कूल की टिफिन पैक करके, नहा धोकर, पूजा करके, कुर्ता धारण किया और बैग उठाकर निकल जाता था।घूम फिर कर 3:30 बजे लौट आता था।हँसी आती थी परिस्थितियों को देखकर कि जो काम खुद छात्र जीवन में लोग करते हैं वो मैं अब कर रहा हूँ ।किसी काम में मन नहीं लगता था लेकिन पिताजी के सामने नाटक करना पड़ रहा था।इसी बीच एक विद्यालय में मेरे विषय में रिक्त स्थान का इश्तिहार आया और वह विद्यालय दिल्ली में बड़ा नामी था क्योंकि भारतीय टीम के इशांत शर्मा 3-4 वर्षों पहले ही वहीं से निकले थे।पिताजी को बताया तो उन्होंने कहा जाओ और देख आओ।मैं गया और साक्षात्कार बढ़िया हुआ और अपनी शर्त पे मुझे नौकरी मिल भी गई, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।
जैसे ही प्रिंसिपल के चैम्बर से खुश होते हुए निकला पीछे से एक आवाज आई, 'अनुराग सर'।पीछे मुड़कर देखा तो एक मित्र थे और उन्होंने पूछा 'आप यहाँ कैसे? ' मैंने उनसे पूछा कि आपके यहाँ कोई छोड़ कर गया है क्या कि वैकेन्सी आई है?'
फिर मैंने बताया कि मेरी नियुक्ति हो गयी है यहाँ । उन्होंने कहा 'नहीं कोई छोड़ कर नहीं गया है, जो टीचर है उसको निकालने के लिए वैकेन्सी आई है ' मैंने कहा कि क्यों? उन्होंने कहा 'लड़का बहुत बढ़िया है, विषय पर पकड़ भी जबरदस्त है, बस अंग्रेजी की समस्या है, उतनी धाराप्रवाह नहीं है।अभी दो ही साल हुए हैं, लेकिन बहुत बढ़िया टीचर है, बच्चे भी संतुष्ट हैं '। हमने पूछा "अकेले रहता है कि घर परिवार है यहाँ?। सिंह साहब ने कहा कि "सर बीवी और दो बच्चों के साथ"। मैं तुरंत यू-टर्न लिया और प्रिसिपल के चैम्बर में जाकर नियुक्ति पत्र वापस करते हुए माफी माँगी और बाहर आया तो देखा कि सिंह साहब इंतजार कर रहे थे।
उन्होंने पूछा 'कहाँ गए थे आप?' मैंने बताया तो उन्होंने कहा 'ये क्या किया आपने?'
मैंने कहा ' सिंह साहब अगर आप मुझे नहीं मिले होते और नहीं बताते तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन आपने जो बताया उसके लिए मेरी अंतरात्मा और मेरे संस्कार मुझे नहीं इजाजत देते है कि मैं जानने बाद भी किसी के पेट पर लात मारूं वो भी जिसके दो मासूम बच्चे हों।मैं जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगा।'
सिंह साहब मुझे ऐसे देखने लगे जैसे मैंने क्या कर दिया, फिर हाल चाल हुआ और मैं 3:30 बजे लौट आया अपने कमरे पर।मुझे नौकरी जाने का का कोई गम नहीं था, बल्कि एक सुकून था, खुशी थी इसलिए जब कमरे पर पहुँचा तो पिताजी का सामना करने में कोई समस्या नहीं थी।
लौटा तो पिताजी ने कहा ' क्या हुआ?'।मैंने कहा कि 'पापा ढंग की सैलरी ही नहीं दे रहे थे, मात्र 34000 उतनी तो मैं यहां ही पा रहा हूँ ।' गजब के विश्वास से मैंने कहा, तो पापा ने कहा 'ठीक किया, नई जगह जाने पे कुछ तो फायदा मिलना चाहिए, जीरो से शुरू करना पड़ता है '। कुछ इधर उधर के काम किए और कुछ कापियाँ पहले के बच्चों के नोट्स की पड़ी थी, दिखावे के लिए उनको जांचा और लैपटाप पर कुछ इधर उधर करता रहा।पिताजी कुछ कहते भी तो कहता था 'रूकिए 10 मिनट स्कूल काम कर रहा हूँ, लेसन प्लैन बना रहा हूँ' ताकि कहीं से भी शंका की कोई गुंजाईश न रह जाए।
लेकिन सबसे बढ़िया बात यह थी कि मुझे चैन की नींद आई पहली बार उस घटना के बाद ।
(शेष अगली कड़ी में )
                                                                                                                                     '
बेबाकी'

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