गुरुवार, 2 जुलाई 2015

जिंदगी भी हमें आजमाती रही और हम भी उसे आजमाते रहे ३



गर्मी की छुट्टियों के तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार मैं बनारस पहुँचा।सोचा कि अपने मित्रों के बीच रहूँगा तो कुछ हल्का महसूस करूँगा क्योंकि बनारस के भी मित्र उस जनवरी वाली दुर्घटना से जुड़े हुए थे और बहुत ही गम में थे।ये मेरे वो मित्र हैं जिनके साथ बनारस के एक नामी विद्यालय में काम किया था मैं और जिन्होंने मेरे को छोटे भाई की तरह माना था एवं उनसे सीखने को बहुत मिला था।उनसे मिला और पूरी कहानी बताई ।स्कूल भी गया और प्रिन्सिपल मैम से बात हुई लेकिन उनके सामने ये नहीं कहा कि मेरे पास नौकरी नहीं है ।हालाँकि उन्होंने कहा भी और जोर देकर कहा कि  " अनुराग आई वांट यू बैक एंड टुडे आई ऍम गोइंग टू साइन ऐन अपॉइंटमेंट लेटर फॉर यू . नाउ वी हैव ह्यूमैनिटीज आल्सो ऐट +२ लेवल. माय सोशल साइंस डिपार्टमेंट हैज बिकम ऑर्फ़न फ्रॉम दैट डे व्हेन  यू एंड अम्ब्रीश लेफ्ट.वी अप्पोइंटेड मेनी टीचर्स बट कुड नॉट फाइंड द रिप्लेसमेंट ऑफ़ बोथ.द डेडिकेशन , कमिटमेंट, आनेस्टी व्हिच बोथ ऑफ़ यू हैड टुवर्ड्स किड्स एंड द कमांड ऑन योर सब्जेक्ट इज अनमैच्ड .नाउ अम्ब्रीश इज नो मोर इन डिस वर्ल्ड बट ऐटलीस्ट आई कैन कॉल यू बैक ."

इतना कहते ही उनके आँखों से आँसू बहने लगे और वहाँ का वातावरण बहुत ही बोझिल हो गया और मेरे लिए असहनीय हो गया।मेरे कुछ मतभेद रहे थे मैडम से लेकिन मैं उनको ना भी नहीं कह पा रहा था लेकिन मैंने मनभेद उसको नहीं बनाया । मैंने उनसे कहा "मैम थैंक्स फॉर  योर  ऑफर  एंड आई  रेस्पेक्ट  योर  फीलिंग्स  टुवर्ड्स  मी एंड  अम्ब्रीश  भैया  बट मैम  आई  ऐम नॉट इन मूड टू रिटर्न बैक टू बनारस नाउ. बट आई अस्योर यू दैट द डे व्हेन आई विल डिसाइड टू रिटर्न बैक,यू विल बी द फर्स्ट पर्सन हूम आई विल इन्फॉर्म. " इतना कहने के बाद मैं उनसे आज्ञा लेकर वापस आ गया।उनके प्रस्ताव को नहीं करने का कारण यह था कि उनको मेरी जरूरत थी और ये उनकी मजबूरी थी ना कि वाकई में वो मुझे नियुक्त करना चाहती थीं। 2-3 दिन दोस्तों के बीच गुजारने के बाद जहाँ पापा मम्मी रह रहे थे वहाँ जाने का फैसला किया।एक दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भी गया और साथ में पढ़ें मित्र बंधुओं से मुलाकात की।उसी दिन पता नहीं क्या हुआ दिमाग को, सोचा कि घर जाकर समय कैसे कटेगा और सबसे बड़े वाले नाटक को भी बहुत सावधानी से अंजाम देना था।काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विश्वनाथ मंदिर के बांए ओर एक दुकान है किताबों की वहाँ घुस गया।सोचा नहीं था कि क्या लेना है लेकिन कुछ अलग पढ़ने का मन था।समाजशास्त्र की किताबें पसंद आई और इतनी पसंद आई कि 4000 हजार की किताबें ले लीं।उस समय ये भी नहीं सोचा कि पैसों की तंगी है। मैं वहाँ से अब रेणुकूट पहुँचा।एक चीज बताना भूल गया, जिस दिन मैं पिताजी को लेने दिल्ली रेलवे स्टेशन गया था उसी दिन मेरे बचपन का मित्र निकेश जिसके साथ बचपन गुजरा था रेणुकूट में वह भी दिल्ली आया।निकेश ने मुझसे मिलने को कहा और उसी मुलाकात में मैंने उसे बताया कि मैंने नौकरी छोड़ दिया है और उससे कहा कि किसी को न बताए।गलती मुझसे यह हुई कि मैंने उससे यह नहीं बताया कि मेरे घर में किसी को नहीं मालूम है सिवाय मेरी माताजी के जिनको मैंने थोड़ा हिंट जरूर दिया था। रेणुकूट पहुँचा तो सब लोग बहुत खुश।दो छोटी बहनें, भाई पिताजी, माताजी सब कुछ ।सबके लिए मैं कुछ न कुछ लेकर गया था।

असली नाटक तो अब शुरू करना था जोकि असली परीक्षा थी।मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि ऐसा क्या किया जाए ताकि किसी को कोई शक न हो।फिर मैंने तय किया कि रात भर जागरण करूँगा और दिन में सोया जाएगा।जब रात में सब सो जाएँगे तो किसी को कोई शक नहीं होगा और दिन में सब जागेंगे तो मैं सोया रहूँगा। किसी से बाहर बहुत कम मिलूंगा और कोई अचानक मिल भी जाए तो केवल हाल चाल।किसी को कुछ नहीं बताना है।इससे किसी को कोई शक नहीं होगा।

                                                                                                                             (शेष अगली कड़ी में )

                                                                                                                                        '
बेबाकी'

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत रोचक तरीके से लिख रहें आप। पाठक को बांधे रखती है आपकी लेखनी।

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    1. आभार जीजी आपका.बस आप लोगों का आशीर्वाद है जिसे बनाये रखियेगा.

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  2. बहुत रोचक तरीके से लिख रहें आप। पाठक को बांधे रखती है आपकी लेखनी।

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  3. दिल से लिखा हुआ अच्छा ही होता है ।

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