शनिवार, 4 जुलाई 2015

जिंदगी भी हमें आजमाती रही और हम भी उसे आजमाते रहे ४

अब घर पहुँच चुका था और सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि किसी को भी घर में मेरे किसी क्रियाकलाप से संदेह उत्पन्न नहीं होना चाहिए ताकि कोई भी मुझसे किसी प्रकार का कोई प्रश्न कर सके।क्योंकि यदि प्रश्न उठते तो उसमें फँसने की गुंजाईश ज्यादा रहती है।आप चाहकर भी नहीं छुपा पाऐंगे क्योंकि आपका गिरा हुआ आत्मविश्वास और भावभंगिमाऐं आपके खिलाफ गवाही देने के लिए मौकों की तलाश में रहेंगी।अतः मैं रोज शाम को जब अंधेरा हो जाता था तो बाहर निकलता था ताकि मुलाकात किसी से न हो संवाद बहुत कम से कम हो।कोई मिल गया तो हाल चाल हो जाता था।बाजार में हिण्डालको गेट के बांए ओर राजेश की पान की दुकान है जिसके यहाँ मैं पान खाया करता हूँ ।राजेश से मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं और उनको मेरे हिसाब-किताब पर पूरा भरोसा रहता है, इसलिए कभी उनको तत्काल पैसे नहीं देना होता है।मैं वहाँ जाता और पान खाता और कुछ पान बँधवाकर ऐसी जगह जाकर बैठ जाता था जहाँ किसी के आने जाने की संभावना बहुत कम रहती थी।वहीं बैठकर खयालों में डूब जाता था और एक के बाद एक पान चबाता रहता था।9-9:30 बजे तक वहाँ रहता था फिर वापस पान की दुकान पर, पान खाया और बँधवाया रातभर के लिए।यदि घर से किसी चीज को ले आने के लिए कहा गया होता था तो वो खरीदा और वापस घर चल देता था।
उस समय समस्या पैसों की हो रही थी हालाँकि मेरे पास पैसे थे कुछ लेकिन मुझे वापस दिल्ली भी जाना था और वहाँ के अपने खर्च थे साथ में नौकरी का पता नहीं था कि कितने दिन में मिलेगी। मैं किसी भी चीज के लिए नहीं, नहीं कह सकता था क्योंकि ये मेरा घर में सबसे बड़े होने की वजह से उत्तरदायित्व भी था।बहनों या भाई ने यदि कोई सामान मँगाया, या कहा कि भाई ये खिला दो या वो दिला दो तो नहीं तो मैं कर ही नहीं सकता था।माँ को अँदेशा जरूर था मेरी स्थिति का लेकिन वो भी भाई -बहनों को रोक नहीं सकती थीं।मैंने पूरी कोशिश कि किसी के सामने कोई बात नहीं हो माँ से मेरी नौकरी को लेकर क्योंकि यदि वो चिंतित दिखाई दीं तो सबको शक हो सकता था।10:30 बजे घर पहुँच कर मैंने लैपटाॅप ऑन किया और कुछ देखने बैठ जाता था, दो एक घंटे देखा फिर किताब खोली और पढ़ने लगता।यदि मन न लगे कुछ देर पढ़ने के बाद तो टीवी देखने बैठ जाता था।रात भर पान चबाता और ये पूरा कार्यक्रम तब तक चलता था जबतक कोई भोर में उठ नहीं जाता था।हालाँकि पिताजी कि आदत सबसे पहले उठने की थी तो वो ही उठते थे और जैसे ही मुझे एहसास होता कि उठ गए हैं मैं तुरंत किताब लेकर बैठ जाता था।वो उठते और मुझे पढ़ता पाकर पूछते कि मैं सोया नहीं क्या तो मेरा जवाब होता कि दिन में सो लूँगा वैसे भी छुट्टियां चल रही हैं।लेकिन एक बढ़िया बात यह हुई कि इतने दिनों में मैं पूरी किताबें पढ़ गया जो खरीद कर लाया था जो कि मेरे काम आया।
लेकिन एक दिन जब मैं बाहर निकला था तो मेरा मित्र निकेश आया घर पर मुझसे मिलने।उसको किसी जरिए से पता चला कि मैं घर आया हुआ हूँ ।उस समय घर पर मेरी दोनों बहनें थी बाकी सब लोग इधर उधर निकले हुए थे।उसने मुझे आवाज दी तो सुनकर बहन बाहर आई।उसने बताया की मैं घर पर नहीं हूँ।उसने फिर मेरी बहन से ऐसा सवाल पूछा जो कि पूरे नाटक पर पानी फेर सकता था।उसने कहा कि 'अनुराग दिल्ली मिला था बता रहा था कि जाॅब छोड़ दिया है क्या हुआ कोई जाॅब पकड़ा कि नहीं?'।बहन तो सदमे में आ गई और अपने को समहालते हुए कहा 'भईया, भाई ने तो ऐसा कुछ नहीं बताया।भाई आएँगे तो पूछ कर आपको बताऊंगी'।निकेश को लगा कि उससे बहुत बड़ी गलती हुई और उसने बहन को कहा कि 'नहीं रहने दो मैं उससे अभी बाजार में मिल कर पूछ लेता हूँ।' एक बढ़िया काम उसने यह किया कि वह सीधे मुझसे मिला बाजार में और बताया।उसको मैंने पूरी कहानी बताई और उसके साथ वक्त बिता कर वापस घर आ गया।
अब मुझे बहन के प्रश्नों के लिए खुद को तैयार करना था।बहन ने भी किसी को कुछ नहीं बताया और मौका खोज रही थी कि कब अकेले में मुझसे बात करे।उसने एक दिन मुझे घेरा और बहुत मायूस होकर पूछा 'भईया तुम नौकरी छोड़ दिए हो ना और अभी तुम्हारे पास कोई जाॅब नहीं है।भाई झूठ मत बोलना, मैं किसी को नहीं बताऊंगी।' 
मैंने उसे समझाने कि कोशिश कि लेकिन वो मानने को तैयार नहीं हुई।मैंने कहा कि निकेश मुझे दिल्ली में मिला था और मैंने उससे चर्चा की थी कि ये नौकरी छोड़कर दूसरी पकड़ने के मूड में हूँ।अगर नौकरी छोड़ा होता तो मैं इतने इत्मिनान से होता, नौकरी नहीं खोजता'
उसको बात तो समझ में आयी लेकिन वो पूरी तरह वह संतुष्ट नहीं हुई लेकिन उसने इसका जिक्र किसी से नहीं किया ना ही उसने कुछ ऐसा व्यवहार किया जिससे कोई भी उससे उसके व्यवहार का कारण पूछता।'

                                                                                                                           (शेष अगली कड़ी में )
                                                                                                                                                                                                      'बेबाकी'

1 टिप्पणी: