शनिवार, 4 जुलाई 2015

अपने ही आँगन में सौतेली होती हैं और हुई हैं भाषाएँ


पांच-छह साल पहले की बात है . मेरे स्नातक के दिनों के एक मित्र ने मुझे अपने पुत्र के जन्मदिन के समारोह के लिए आमंत्रित किया था.समारोह का आयोजन एक बड़े से होटल में आयोजित किया था.मेरे मित्र और उनकी धर्मपत्नी एक बहुराष्ट्रीय संस्थान में कार्यरत हैं और इस कारण दोनों के सहकर्मी भी आमंत्रित थे.जब मैं वहाँ पहुंचा तो देखा कि वहाँ लोग मुझे घूर-घूर कर देख रहे थे और उनकी भावभंगिमा ऐसी थी जैसे लग रहा था कि कोई गलत व्यक्ति उस प्रांगण में घुस गया हो. मेरे मित्र को देखकर मुझे लगा जैसे वो अपराधबोध से ग्रसित हो गया हो और महसूस कर रहा हो जैसे कि मुझे बुलाकर उसने गलती कर दी हो.इस तरह कि प्रतिक्रिया के पीछे मेरी वेश-भूषा और मेरे द्वारा हिंदी और मेरी मातृभाषा भोजपुरी का प्रयोग था. मुझे इस तरह कि प्रतिक्रिया ने कुछ समय के लिए विचलित भी किया और उसके बाद मेरे मित्र ने कृत्रिमता लिए हुए भावभंगिमा से मेरा स्वागत भी किया. शायद उन लोगों कि नज़र में मैं एक पिछड़ा और अनपढ़ व्यक्ति प्रतीत हो रहा था. उसके बाद मेरे उस मित्र ने मात्र औपचारिकता के कारण मेरा परिचय वहाँ के लोगों से कराया.मैं उस समय दिल्ली के एक बहुत ही नामी-गिरामी विद्यालय में पढ़ा रहा था जो दिल्ली/एनसीआर में माना जाना है. जब उसने उन्हें बताया तो उनको विश्वास नहीं हुआ क्योंकि वहाँ के अध्यापक और अध्यापिकाएं सूटेड-बूटेड हमेशा रहते हैं . मैं ठहरा खांटी देशी आदमी. मुझे वो अध्यापक कम सलेसमैन और सलेसगर्ल ज्यादा लगते हैं. कुछ क्षण वहाँ व्यतीत करने के पश्चात और उनके पुत्र को आशीर्वाद देकर मैं वहाँ से चला आया क्योंकि बाहर के खाने से मेरा कोई सरोकार नहीं रहता और कमरे पर आकर खाना बनाना था.
वहाँ से जब लौट रहा था तो मेरे मन में कई सवाल उठे.
1. अगर मैं अपने ही देश में अपनी मातृभाषा में अपने लोगों से बात नहीं कर सकता या बोल सकता हूँ तो कहाँ बोलूंगा? क्या खुद को मॉडर्न दिखाने के लिए अंग्रेजी बोलना जरूरी है?
2. क्या आधुनिक समाज में जगह बनाने और पाने के लिए अपनी संस्कृति और भाषा छोड़ दूँ ?
3. और अगर मेरे देश के सारे लोग ऐसा करने लगे तो क्या होगा? क्या अपने को सभ्य और मॉडर्न साबित करने के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी?
4. बचपन कि यादें किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत अहम होती है जिन्हे वो भुला नहीं सकता, तो क्या बचपन में मैंने हिंदी अंग्रेजी भोजपुरी में जो भी कुछ पढ़ा है,सुना है, उसे अब भूल जाऊं?
ऐसा नहीं है कि मेरा किसी भी भाषा से बैर है , बल्कि मैं तो यह चाहता हूँ कि मैं ज्यादा से ज्यादा भाषाएँ सीख सकूँ .
हिंदी मेरी मातृभाषा है और विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी भाषा में आपको महारत हासिल करनी है तो सबसे पहले अपनी मातृभाषा में महारत हासिल करनी चाहिए और उसका अच्छा ज्ञान होना चाहिए. यदि आपको मातृभाषा का बढ़िया ज्ञान नहीं है तो आप विदेशी या कोई भी अन्य भाषा सीखने के बावजूद भी उसमे भाव नहीं उत्पन्न कर पाएंगे. महान लेबनानी लेखक एवं कवि खलील जिब्रान ने अपने लेखन कि शुरुआत अरबी में की थी उसके बाद अंग्रेजी में लिखना शुरू किया. उनकी लेखनी, कल्पनाओं और दर्शन में आपको उबके गाँव , वहाँ के पहाड़ों और वहाँ के माहौल की झलक मिलती है. इसका मतलब यह है की कोई भी व्यक्ति अपनी सभ्यता संस्कृति से अलग होकर एक अच्छा लेखक और कलाकार नहीं बन सकता है.
दूसरी अहम बात हमें इतिहास से सीखने को मिलती है की किसी भी देश को बर्बाद करना हो तो सबसे पहले उसकी भाषा को बर्बाद करो और ख़त्म कर दो. शायद जर्मनी,फ्रांस,जापान और चीन के समाज इस सच्चाई से परिचित थे इसलिए उन्होंने अपनी मातृभाषा को कभी ख़त्म होने नहीं दिया . इन देशों ने अपनी मातृभाषा को बचने के सभी संभव प्रयास और उपाय किये. यही नहीं तुर्की और मलेशिया जैसे देश भी हैं , जिन्होंने अपनी मातृभाषा को बचने के लिए काफी मशक्कत की.
यदि मैं आपके सामने आजादी और प्रभुसत्ता जैसे शब्दों का प्रयोग करून तो आपके मन में क्या ख्याल आता है? ये शब्द आपके मन में एक भावना पैदा करते हैं.ये शब्द हमारे जीवन के हालत को बताते हैं . ये सिर्फ मुंह से निकलने वाले शब्द भर नहीं हैं ,बल्कि ये हमारी मानसिकता,हमारी समझ, बल्कि हमारी भावनाओं को व्यक्त करने का शशक्त माध्यम है.भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है ,विचार को प्रकट करती है जो हमें बताती है की हम कैसे रहते हैं,हम क्या सोचते हैं और हमें एक दुसरे को समझने में मदद करती है. और ये सब प्राकृतिक रूप से केवल मातृभाषा में संभव है.
लेबनान में पाली बढ़ी सुज़ैन टोल्हौक एक सामाजिक कार्यकर्ता और कवियित्री हैं.उन्होंने अरबी भाषा को बचाने के लिए एक अभियान चलाया. उन्होंने 'शफील आमेर' नामक एक संगठन चलाया जो लेबनॉन के लोगों को अरबी भाषा के बारे में जागरूक करता है. उन्होंने सर्वप्रथम सिविल सोसाइटी के द्वारा मातृभाषा को मुद्दा बनाया और मातृभाषा के लिए अभियान चलाया. उनसे बहुत से लोगों ने कहा की वो अपना समय और ऊर्जा नष्ट कर रही हैं मगर वो देतीं रहीं और उनका प्रथम अभियान बहुत सफल हुआ.फिर उनका दूसरा अभियान शुरू हुआ जिसमे उन्होंने लोगों से अपनी मातृभाषा को नष्ट न करने की अपील के साथ साथ उसके अधिक से अधिक प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया .यही उनका नारा था जिसमे उन्होंने लोगों को समझाया की अगर उनकी मातृभाषा ख़त्म हो गयी तो उनकी पहचान ख़त्म हो जाएगी , और पहचान ख़त्म हो गयी तो अस्तित्व सवाल बन कर खुद के सामने खड़ा हो जाएगा.
मुझे लगता है कि यदि आप कुछ रचनात्मक कार्य करना चाहते हैं तो, तो इसके लिए मातृभाषा सबसे बेहतर माध्यम है. मसलन अगर आप उपन्यास लिखना चाहते हैं तो अपनी मातृभाषा में काम करिये. मातृभाषा में काम करने से आप बेहतर ढंग से बेहतर से बेहतर भाव व्यक्त कर पाएंगे. यदि आपकी मातृभाषा हिंदी है तो हिंदी में काम करें,तमिल है तो तमिल में काम करें,बांग्ला है तो बांग्ला, इत्यादि में काम करें. रचनात्मक कार्य ही क्यों अपनी दिनचर्या का अंग बनाइये, दिखावे भर के खातिर उसकी अवहेलना मत करिये. साथ साथ आपको यह भी प्रयास करना चाहिए कि आप और भाषा सीखिये और दूसरी भाषाओँ के प्रति संवेदनशील रहे. मेरे अपने जीवन में मैं यही विचार रखता हूँ और उसी के अनुसार कार्य करता हूँ. लेकिन विडम्बना यह है कि लोगों ने भाषा को जीविकोपार्जन से जोड़ दिया है और उसी दृष्टिकोण से देखते हैं जो केवल संकीर्णता का परिचायक है.मैं हर भाषा को सीखना चाहता हूँ, उससे प्रेम करना चाहता हूँ , पर यदि कोई भाषा मुझपर थोपी जायेगी तो मेरी नजर में वो भाषा 'हत्यारिन' है या अंग्रेजी में कहा जाए तो 'किलर लैंग्वेज' होगी. आइये हम अपनी मातृभाषा में काम करें, अपनी पहचान बनाएं,और उसके साथ जीते हुए अपने जीवन को सार्थक करें.

6 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपके विचारों को एक साँस में पूरा पढ़ गया.. वाकई मातृभाषा को बोलने-लिखने में जिसे शर्म या घृणा होती है, वो वास्तव में अपनी संस्कृति को शर्मिन्दा कर रहा है.

    आपके हिन्दी ब्लॉग का अनुसरण कर रहे हैं. आशा है कि आगे भी आपके विचारों से हम अवगत होंगे. सादर..

    ब्लॉग :- ज्ञान कॉसमॉस
    फेसबुक पेज :- ज्ञान कॉसमॉस

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद भाई जो आपने मेरे ब्लॉग का अनुसरण किया. मुझे कत्तई अपनी भाषा बोलने में कोई झिझक नहीं है. जहाँ अंग्रेजी की आवश्यकता होती है वहाँ अंग्रेजी बोलता हूँ यदि कोई मेरी भाषा समझने वाला न हो, जहाँ कड़ी हिंदी वहां कड़ी हिंदी,जहाँ भोजपुरी वहां भोजपुरी.

      हटाएं
  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हास्य कवि ओम व्यास 'ओम' और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. ब्लाग फौलोवर लिंक रखें तो ब्लाग पर छपने की खबर मिलती रहेगी ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सर ब्लॉग पर नया हूँ , आप मुझे तरीका बताएं.

    उत्तर देंहटाएं